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कक्षा 9 हिंदी – क्षितिज भाग 1

📖 अध्याय 3: उपभोक्तावाद की संस्कृति

NCERT समाधान - सभी प्रश्नों के हल हिंदी में। CBSE और RBSE बोर्ड के लिए।

लेखक: श्यामाचरण दुबे

प्रश्न अभ्यास (NCERT Textbook Questions)

प्रश्न 1: उपभोक्तावाद क्या है? इससे क्या अभिप्राय है?
उत्तर: उपभोक्तावाद एक ऐसी प्रवृत्ति है जिसमें व्यक्ति वस्तुओं और सेवाओं का अधिक से अधिक उपभोग करना चाहता है। इसका अभिप्राय है कि मनुष्य अपनी आवश्यकताओं से अधिक वस्तुओं का उपभोग करने लगता है। यह उपभोग उसकी आवश्यकता नहीं, बल्कि दिखावा और प्रतिस्पर्धा बन जाता है। उपभोक्तावाद वस्तुओं के उत्पादन और खपत को बढ़ावा देता है, परंतु यह मानवीय मूल्यों और संस्कृति को नष्ट करता है .
प्रश्न 2: उपभोक्तावाद की संस्कृति से क्या तात्पर्य है?
उत्तर: उपभोक्तावाद की संस्कृति से तात्पर्य उस जीवन-शैली से है जिसमें व्यक्ति वस्तुओं के उपभोग को ही जीवन का लक्ष्य मान लेता है। इस संस्कृति में मनुष्य अधिक से अधिक वस्तुएँ खरीदता है, चाहे उसे उनकी आवश्यकता हो या न हो। वह दूसरों को दिखाने के लिए महँगी वस्तुएँ खरीदता है। इस संस्कृति में मूल्यवत्ता वस्तुओं की कीमत से तय होती है, न कि उनकी उपयोगिता से। इससे समाज में प्रतिस्पर्धा, ईर्ष्या और असंतोष बढ़ता है .
प्रश्न 3: लेखक ने उपभोक्तावाद की संस्कृति को किस प्रकार परिभाषित किया है?
उत्तर: लेखक के अनुसार, उपभोक्तावाद की संस्कृति वह संस्कृति है जिसमें मनुष्य अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए नहीं, बल्कि दिखावे और प्रतिस्पर्धा के लिए वस्तुओं का उपभोग करता है। इसमें मनुष्य वस्तुओं का दास बन जाता है। वह अपनी हैसियत और प्रतिष्ठा बनाए रखने के लिए अनावश्यक वस्तुएँ खरीदता है। यह संस्कृति मनुष्य को भौतिकवादी बना देती है और उसके आंतरिक मूल्यों को नष्ट कर देती है .
प्रश्न 4: उपभोक्तावाद की संस्कृति के कारण मनुष्य के जीवन में क्या-क्या परिवर्तन आए हैं?
उत्तर: उपभोक्तावाद की संस्कृति के कारण मनुष्य के जीवन में निम्नलिखित परिवर्तन आए हैं:
  • मनुष्य भौतिकवादी हो गया है और वस्तुओं के पीछे भाग रहा है।
  • वह दिखावे और प्रतिस्पर्धा के लिए अनावश्यक वस्तुएँ खरीदता है।
  • उसके जीवन में संतोष और शांति समाप्त हो गई है।
  • वह दूसरों से आगे निकलने की होड़ में लगा रहता है।
  • उसके पारिवारिक और सामाजिक संबंध कमजोर हो गए हैं।
  • वह अपनी आर्थिक क्षमता से अधिक खर्च करता है और कर्ज में डूब जाता है।
प्रश्न 5: उपभोक्तावाद की संस्कृति का समाज पर क्या प्रभाव पड़ता है?
उत्तर: उपभोक्तावाद की संस्कृति का समाज पर गहरा प्रभाव पड़ता है:
  • समाज में प्रतिस्पर्धा और ईर्ष्या की भावना बढ़ती है।
  • धनी और निर्धन के बीच की खाई बढ़ती है।
  • सामाजिक संबंधों में स्वार्थ और दिखावा प्रमुख हो जाता है।
  • नैतिक और सांस्कृतिक मूल्यों का ह्रास होता है।
  • अपराध और भ्रष्टाचार बढ़ता है।
  • पारिवारिक एकता और सामाजिक सामंजस्य पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है।
प्रश्न 6: लेखक ने उपभोक्तावाद को रोग क्यों कहा है?
उत्तर: लेखक ने उपभोक्तावाद को रोग इसलिए कहा है क्योंकि यह मनुष्य को धीरे-धीरे खोखला बना देता है। यह एक ऐसा रोग है जो मनुष्य को भौतिकवादी बनाता है, उसके आंतरिक मूल्यों को नष्ट करता है और उसे वस्तुओं का दास बना देता है। यह रोग समाज में प्रतिस्पर्धा, ईर्ष्या, असंतोष और अपराध को जन्म देता है। इससे मानवीय संबंध टूटते हैं और समाज बिखर जाता है .
प्रश्न 7: उपभोक्तावाद की संस्कृति से बचने के लिए क्या उपाय किए जा सकते हैं?
उत्तर: उपभोक्तावाद की संस्कृति से बचने के लिए निम्नलिखित उपाय किए जा सकते हैं:
  • अपनी आवश्यकताओं को सीमित रखें और आवश्यक वस्तुओं का ही उपभोग करें।
  • दिखावे और प्रतिस्पर्धा से बचें।
  • संतोष और सादगी को जीवन में अपनाएँ।
  • आध्यात्मिक और नैतिक मूल्यों को अपनाएँ।
  • पारिवारिक और सामाजिक संबंधों को मजबूत बनाएँ।
  • जागरूकता फैलाएँ और लोगों को उपभोक्तावाद के दुष्प्रभावों के बारे में बताएँ।

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